रंगों का त्योहार होली सिर्फ हुड़दंग का नाम नहीं – जनप्रिय कवि,सूरज त्रिवेदी

बुरा न मानो होली है, पर सच कहना भी जरूरी है!”
बहराइच,(आनन्द धारा)। लोकप्रिय युवा कवि सूरज त्रिवेदी अपनी धारदार कलम और अनूठे अंदाज के लिए जाने जाते हैं। इस होली पर उन्होंने ‘जोगीरा’ के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर जो कटाक्ष किए हैं, वह चर्चा का विषय बने हुए हैं। बहराइच के कवि सूरज त्रिवेदी ने ‘जोगीरा’ के जरिए समाज को दिखाया आईना
बहराइच। रंगों का त्योहार होली सिर्फ हुड़दंग का नाम नहीं, बल्कि बुराइयों को जलाने और समाज को जगाने का भी अवसर है। जनपद के उभरते और जनप्रिय युवा कवि सूरज त्रिवेदी ने इस बार होली के पारंपरिक ‘जोगीरा’ को एक नया आयाम दिया है। उन्होंने अपने जोगीरा गायन के माध्यम से न केवल होली की मस्ती बिखेरी, बल्कि गंभीर सामाजिक मुद्दों पर भी तीखे प्रहार किए।
परंपरा और सरोकार का संगम
कवि सूरज त्रिवेदी ने ‘जोगीरा सरररर’ की गूँज के साथ भ्रष्टाचार, बढ़ती महंगाई, और आपसी भाईचारे जैसे विषयों को अपनी पंक्तियों में पिरोया। उन्होंने बताया कि कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि समाज की सोई हुई चेतना को जगाने का एक माध्यम है।
प्रमुख अंश: हास्य के साथ कड़वा सच
उनके जोगीरा के कुछ अंशों ने श्रोताओं की खूब तालियां बटोरीं, जिनमें उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा:
बुरा न मानो होली है, पर सच कहना भी जरूरी है!”
उन्होंने अपनी प्रस्तुति में डिजिटल होती दुनिया और इंसानों के बीच बढ़ती दूरियों पर भी कटाक्ष किया। सूरज त्रिवेदी का मानना है कि यदि हम अपनी लोक परंपराओं (जैसे जोगीरा और फगुआ) के माध्यम से कुरीतियों पर प्रहार करें, तो उसका प्रभाव गहरा होता है।
जनता का मिल रहा अपार प्रेम
स्थानीय स्तर पर अपनी बेबाक कविताओं के लिए मशहूर सूरज त्रिवेदी की इस पहल की हर तरफ सराहना हो रही है। सोशल मीडिया से लेकर चौपालों तक, उनके ‘सामाजिक जोगीरा’ के वीडियो और पंक्तियां जमकर साझा की जा रही हैं।
“मेरा प्रयास है कि होली के रंगों के साथ-साथ विचारों की शुद्धि भी हो। जोगीरा हमारी वह विरासत है जिसमें हम हंसते-हंसते बड़ी बात कह जाते हैं।”



