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बंगाली कायस्थों को साधने के लिए नितिन को बागडोर- जितेन्द्र बच्चन

गाजियाबाद,(आनन्द धारा न्यूज़)। पश्चिम बंगाल में खेला होगा, यह तो सभी जानते हैं। लेकिन खेल का असली मदारी कौन है, यह नितिन नबीन की ताजपोशी से पता चलता है। नितिन को देश की सबसे बड़ी पार्टी का ताज उस दौर में मिला है जब बिहार से लेकर देशभर में जाति आधारित वोट बैंक की राजनीति केंद्र में है। कायस्थ समाज के नितिन को बीजेपी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पीएम मोदी ने सियासत की बाजी पलट दी है। बीजेपी के ऐलान ने जहां उन तमाम अटकलों को गलत साबित कर दिया जिनमें बड़े दिग्गजों को पार्टी की कमान सौंपने की चर्चा हो रही थी, वहीं 45 साल के नितिन नबीन पर दांव खेलकर मोदी ने ‘मिशन बंगाल’ को लेकर अपने इरादे भी साफ कर दिए हैं।
पश्चिम बंगाल में कायस्थों की अच्छी खासी आबादी है और उन्हें ब्राह्मणों व वैद्यों के साथ बंगाल की पारंपरिक उच्च जातियों (भद्रलोक) में गिना जाता है, जो शिक्षा, लेखन और प्रशासन से जुड़े हुए हैं। बंगाल में आजादी के बाद 37 साल तक कायस्थों के हाथ में सत्ता रही है और करीब 24 लाख मतदाता इस वर्ग के हैं। बंगाल में सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु भी कायस्थ थे। यहां के कायस्थ सदियों से भूमिधर हैं। बंगाल के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में उनका महत्वपूर्ण वर्चस्व है। ऐसे में मोदी का मानना है कि कायस्थ्य समाज के नितिन नबीन बीजेपी के लिए बंगाल विधानसभा चुनाव में ट्रंप कार्ड साबित हो सकते हैं और उनके संकेत पर पार्टी ने 14 दिसंबर को नितिन नबीन को जेपी नड्डा का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस तरह यह नियुक्ति भाजपा के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रीय नेता रूप में दर्ज हो गई है।
दरसअल, बिहार विधानसभा चुनाव (2025) में बीजेपी ने पारंपरिक रूप से कायस्थ बहुल सीटों, जैसे कुम्हरार में कायस्थ उम्मीदवारों के टिकट काट दिए या उनकी जगह दूसरी जातियों के उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया। इससे कायस्थों में यह भावना पैदा हो गई कि पार्टी उन्हें कम महत्व दे रही है। इससे पहले केंद्र और राज्यों के मंत्रिमंडल में भी कायस्थ संगठनों की शिकायत रही है कि उनके समाज के विधायकों को मंत्रिमंडल में उचित स्थान नहीं दिया गया, जबकि पार्टी का कायस्थ समाज वफादार मतदाता रहा है। अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय के नेताओं को समायोजित करने की बीजेपी की सामाजिक इंजीनियरिंग नीति में भी कायस्थों को हाशिए पर धकेल दिया गया। इससे कायस्थों में असंतोष पनपने लगा, जिसे दूर करने के प्रयास में बीजेपी ने बिहार के कायस्थ नेता नितिन नबीन को पार्टी की बागडोर सौंप दी। नरेंद्र मोदी के इस कदम को कायस्थ समाज के बीच डैमेज कंट्रोल (नुकसान की भरपाई) के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। मोदी के इस फैसले से कायस्थ समाज की नाराजगी भी दूर हो गई और बंगाल के कायस्थों का वोट मिलना भी अब पक्का माना जा रहा है।
लेकिन बीजेपी के नए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बंगाल और असम चुनाव से पहले महाराष्ट्र में बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) समेत 29 नगर निकायों में 15 जनवरी 2026 को चुनाव की घोषणा हो गई है। बीजेपी की अगुवाई वाली महायुति सरकार का एक साल बाद यह पहला लिटमस टेस्ट होगा। जबकि असम विधानसभा चुनाव मार्च-अप्रैल में कराया जा सकता है। बीजेपी यहां लगातार दो बार से सत्ता में है। 126 सीटों वाली विधानसभा में एनडीए ने 75 सीटें जीती थीं। हिमंता बिस्वा सरमा की अगुवाई में बीजेपी के लिए यहां लगातार तीसरी जीत हासिल करने की बड़ी चुनौती होगी। देखना है कि नितिन नबीन इन चुनौतियों से कैसे पार पाते है।

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