भद्रा , सूतक और चन्द्र ग्रहण के पेंच में फंसा होलिका दहन

भद्रा पुच्छ में भी होलिका दहन कर सकते हैं। लेकिन यह शास्त्रीय विधान के अनुसार ठीक नहीं है।
इस बार नहीं होगा होलिका दहन।
4 तारीख को खेला जाएगा रंग
शिव शंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र गाजियाबाद के आचार्य पंडित शिवकुमार शर्मा के अनुसार इस वर्ष होली दहन को लेकर पेंच फस गया है।
पंचांगों में होलिका दहन 2 मार्च को दिया हुआ है। क्योंकि शाम 5:55 बजे से पूर्णिमा तिथि आएगी जो प्रदोष व्यापिनी है ।
शास्त्रों में वर्णित है
प्रदोषे होलिकादाह: स्मृतिषु प्रकीर्तित:।
अर्थात होलिका दहन प्रदोष काल में ही पूर्णिमा तिथि होने पर करना चाहिए।
लेकिन इस बार पूर्णिमा तिथि आरंभ होने से ही भद्रा आरंभ हो जाएंगी । जो लगभग 12 घंटे रहती है। इसीलिए 2 मार्च को पूर्णिमा प्रदोष काल में तो है, लेकिन भद्रा काल में होलिका दहन निषिद्ध है।
कुछ विद्वानों का मत हैं कि भद्रामुख और भद्रामध्य के समय को छोड़कर भद्रा पुच्छ में होलिका दहन कर सकते हैं।
उनके अनुसार होलिका दहन भद्रा पुच्छ के समय 3 मार्च को प्रातः 3:24 बजे से 5:33 बजे तक रहेगा। 5:33 बजे भद्रा समाप्त हो जाएगी।
इसके पश्चात प्रातः 6:20 बजे से चंद्र ग्रहण का सूतक का आरंभ होगा।
कुछ विद्वानों का मत हैं कि 3 मार्च को 3:24 बजे से भद्रा पुच्छ में होलिका दहन कर सकते हैं। अथवा प्रातः 5:33 से 6:20 तक होलिका दहन कर सकते हैं।
लेकिन पूर्णिमा को भद्रा होने से भद्रा का वास पृथ्वी लोक में होता है। इसलिए तीनों ही कालों में होलिका दहन वर्जित हैं।
शास्त्रीय विधान यह भी कहता है कि
प्रातःकाले न कर्तव्यं दहन कर्म किञ्चन।
होलिका प्रदोष और पूर्णिमा का पर्व है इसको प्रातः काल की वेला में नहीं करना चाहिए।
3 मार्च को भी पूर्णिमा सूर्यास्त से पहले 5:07 बजे समाप्त हो रही है। अर्थात 3 तारीख को भी होली दहन का प्रदोष काल नहीं मिल रहा है।
विशेष बात यह है कि दिनांक 3 मार्च को चंद्र ग्रहण भी है।
चंद्र ग्रहण अपराह्न 3:20 बजे आरंभ होगा और शाम 6: 47 बजे समाप्त होगा।
जो भारत में चंद्रोदय के समय दिखाई देगा। इसका सूतक प्रातः 6:20 बजे लग जाएगा। सूतक काल में उत्सव, पूजन ,व्रत आदि करना निषेध होता है इसीलिए 3 तारीख को रंग भी नहीं खेला जा सकता है।
क्योंकि 4 मार्च को प्रतिपदा शाम 5:00 बजे तक है ।
इसलिए रंग खेलने का पर्व (दुल्हैंडी) तो 4 तारीख को ही मनाया जाएगा।
होलिका दहन यदि चाहे तो प्रतीकात्मक रूप में भद्रा पुच्छ के समय प्रातः 3:24 से 5:33 बजे तक अथवा भद्रा समाप्ति पर 5: 34 से 6:20 बजे से पहले कर सकते हैं। भद्रा काल में होलिका दहन करना राष्ट्र के ऊपर बहुत भारी होता है। विद्रोह ,अपमृत्यु,संघर्ष ,अराजकता भूकंप आदि का भय बना रहता है।
इस समय होलिका दहन प्रतीकात्मक कर सकते हैं।
प्रत्यक्षत: शास्त्रों में तो निषेध है।
धर्म सिन्धु के अनुसार,
भद्रायां होलिकादाहे राष्ट्रस्य विप्लवो भवेत्।
अर्थात भद्रा काल में होलिका दहन से राष्ट्र में विप्लव हो सकता है
निर्णयसिन्धु में कहा गया है,
भद्रायां न प्रदाह्येत् होलिका लोकदाहिनी।
भद्रायां क्रियमाणं तु दाहकर्म न शोभनम्।
अर्थात भद्रा काल में किया गया होलिका दहन देश के लिए अशुभ होता है।इसलिए होलिका दहन भद्रा काल में कदापि नहीं करना चाहिए।
पंडित शिवकुमार शर्मा,
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु कंसलटेंट गाजियाबाद



