युवाओं के मस्तिष्क दोहन का षड्यंत्र है वैलेंटाइन डे -पंडित शिवकुमार शर्मा

इतिहास में वैलेंटाइन का कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है
भारत में तो सीताराम ,शिव पार्वती, राधा कृष्ण जैसे आदर्श प्रेम की अवधारणा की गई है – पंडित शिवकुमार शर्मा
वर्तमान वैश्वीकरण के युग में वैलेंटाइन डे एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव के रूप में स्थापित हो चुका है। किंतु भारत जैसे प्राचीन सांस्कृतिक राष्ट्र में, जहाँ प्रेम को धर्म, मर्यादा एवं उत्तरदायित्व से संबद्ध माना गया है, वहाँ इस पर्व की ऐतिहासिक प्रामाणिकता, सांस्कृतिक अनुकूलता तथा सामाजिक प्रभावों का गहन परीक्षण आवश्यक है। इसके लिए वैलेंटाइन नामक संत की ऐतिहासिकता, वैलेंटाइन डे के विकास, भारतीय शास्त्रीय प्रेम-दृष्टि तथा आधुनिक नवयुवकों पर इसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों का तुलनात्मक एवं तथ्यात्मक अध्ययन इस प्रकार है:
भारतीय सभ्यता में उत्सव केवल आनंद का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों के संवाहक रहे हैं। इसके विपरीत आधुनिक वैश्विक पर्व प्रायः बाजार, उपभोग और प्रदर्शन से जुड़े होते हैं। वैलेंटाइन डे भी ऐसा ही एक पर्व है, जिसे प्रेम का प्रतीक माना जाता है। प्रश्न यह है कि क्या यह प्रेम-दृष्टि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के अनुरूप है?
.इतिहास में वैलेंटाइन नाम से संबद्ध कथाएँ तीसरी शताब्दी ईस्वी के रोमन साम्राज्य से जुड़ी हैं। उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि—
वैलेंटाइन का प्रेम-दिवस से संबंध प्रत्यक्ष ऐतिहासिक नहीं, बल्कि परवर्ती साहित्यिक मात्र कल्पना है।
5वीं शताब्दी में चर्च द्वारा 14 फरवरी को वैलेंटाइन दिवस के रूप में घोषित किया गया।
प्रेम-उत्सव का स्वरूप मध्यकालीन यूरोप में विकसित हुआ।
अतः वैलेंटाइन डे का आधार ऐतिहासिक कम और सांस्कृतिक-काल्पनिक अधिक है।
भारतीय शास्त्रों में प्रेम की अवधारणा इस प्रकार है ,
भारतीय दर्शन प्रेम को केवल भावना नहीं, बल्कि साधना मानता है।
धर्मार्थकाममोक्षाणां समन्वयः जीवनं मतम्।
अर्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संतुलन ही मानव जीवन का लक्ष्य है।
यहाँ काम को धर्म से पृथक नहीं, बल्कि उसके अधीन माना गया है।
कामशास्त्र प्रसिद्धविद्वान महर्षि
वात्स्यायन के अनुसार-
धर्माविरोधी कामः स्यात् स कामः शास्त्रसम्मतः।
अर्थ – जो काम (प्रेम) धर्म के विरुद्ध न हो, वही शास्त्रसम्मत है।
यह स्पष्ट करता है कि भारतीय संस्कृति में प्रेम अनुशासित और मर्यादित है।
बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार
न वा अरे पतिः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।
अर्थ – पति, पत्नी के लिए नहीं, बल्कि आत्मा के आनंद के लिए प्रिय होता है।
यहाँ प्रेम का मूल आत्मिक तत्त्व है, न कि केवल शारीरिक आकर्षण।
संस्कृत के प्रसिद्ध कवि कालिदास जी ने भी अपनी कृति अभिज्ञानशाकुन्तलम् में कहा है
*स्नेहः स्वभावो न भवेत् विकारः
अर्थ – स्नेह स्वभाव है, कोई विकृति नहीं।
कालिदास का प्रेम संयम, प्रतीक्षा और उत्तरदायित्व से जुड़ा है।
आधुनिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि प्रेम का व्यावसायीकरण युवाओं में भावनात्मक अस्थिरता उत्पन्न करता है।
“रिलेशनशिप स्टेटस” सामाजिक दबाव का कारण बनता है।
प्रेम को उपभोग-वस्तु समझने की प्रवृत्ति संबंधों की पवित्रता को नष्ट करती है।
. वैलेंटाइन डे के बारे मे पाश्चात्य अंधा अनुकरण करके हमारा नवयुवक अपने सांस्कृतिक मूल्यों से हट चुका है। उनका तो उद्देश्य है कि
विदेशी सामाजिक संरचना को बिना विवेक अपनाया जाए।
भारतीय युवाओं को सांस्कृतिक जड़ों से काट दिया जाए।
यह आत्मपहचान और सांस्कृतिक स्वाभिमान को खोने का पर्व है।
भारत जैसे विशाल देश में रोज डे प्रपोज डे, चॉकलेट डे,न जाने किन-किन डेज को विकसित करके भारत के नवयुवकों के मस्तिष्क का दोहन किया जा रहा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है।
वास्तव में वैलेंटाइन डे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित प्रेम-पर्व नहीं है।
भारतीय संस्कृति में प्रेम का स्वरूप अधिक गहन, नैतिक और उत्तरदायी है।
नवयुवकों में विकृति का कारण प्रेम नहीं, बल्कि असंयमित अनुकरण है।
अतः भारतीय समाज के लिए समाधान यह नहीं कि प्रेम का विरोध किया जाए, बल्कि यह कि—
संयमेन प्रेमः संस्कारो भवति।
अर्थात् संयम से युक्त प्रेम ही संस्कार बनता है।
भारत को वैलेंटाइन डे की नहीं,
राधा-भाव, सीता-मर्यादा और पार्वती-धैर्य की आवश्यकता है।
जहाँ प्रेम केवल एक दिन का उत्सव नहीं,बल्कि पूरे जीवन का धर्म होता है।
पंडित शिवकुमार शर्मा, ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु कंसलटेंट गाजियाबाद



