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नवरात्रि पर्व 19 मार्च से शुरू होंगे, 27 मार्च को रामनवमी का पर्व हर्षाल्लास से मनाया जाएगा

गाजियाबाद,(आनन्द धारा)। सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर के पीठाधीश्वर, जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता एवं दिल्ली संत महामंडल के अध्यक्ष श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि चौत्र नवरात्रि का शुभारंभ गुरूवार 19 मार्च से हो रहा है। 27 मार्च को रामनवमी का पर्व धूमधाम व श्रद्धाभाव से मनाया जाएगा। श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि चौत्र नवरात्रि को वासंतिक नवरात्रि भी कहा जाता है क्योंकि क्योंकि यह वसंत ऋतु के दौरान आती है। कड़ाके की ठंड खत्म होने के बाद मार्च-अप्रैल के महीनों मेंए जब गर्म मौसम की शुरुआत होती है, तब प्रकृति में नए जीवन का संचार होता है। यह ऋतु परिवर्तन का समय है, जिसे हिंदू धर्म में माता की शक्ति और नई शुरुआत का समय माना जाता है, इसलिए इसे वसंत के नाम पर वासंती नवरात्र कहते हैं। नवरात्रि पर्व का ह्रिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व है क्योंकि यह पर्व शक्ति का पर्व है और जीवन में नई उर्जा व उत्साह का प्रतीक है। इस दिन से ही ब्रहमा जी ने सृष्टि की रचना की थी। माता पार्वती का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसी कारण मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में पहले दिन शैलपुत्री यानि मां पार्वती की आराधना होती है। विक्रमादित्य का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ। इसी कारण हिंदू नववर्ष यानि विक्रम संवत की शुरूआत भी इसी दिन से होती है।
घटस्थापना प्रातः 6.52 से 7.53 तक होगी
श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने बताया कि 19 मार्च को घट यानि कलश स्थापना का समय प्रातः 6.52 से 7.53 तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12.05 से 12.53 बजे तक कलश स्थापना करना भी शुभ रहेगा। इसके बीच में भी कलश की स्थापना की जा सकती है। महाराजश्री ने बताया कि किसी भी पूजा, व्रत आदि से पहले कलश स्थापना का बहुत अधिक महत्व होता है। इसके बिला पमजा अधूरी रहती है। शास्त्रों में कलश को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। इसी कारण पूजा-हवन आदि प्रत्येक शुभ कार्य कलश स्थापना के बाद ही होता है।
नवरात्र पर मां के नौ स्वरूपों की पूजा होती है
श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि मां दुर्गा के नौ स्वरूप बताए गए हैं और नवरात्रि पर्व पर प्रत्येक स्वरूप की पूजा-अर्चना होती है।  19 मार्च को पहले स्वरूप मां शैलपुत्री, 20 मार्च को दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी पूजा, 21 मार्च को तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा, 22 मार्च को चौथे स्वरूप, मां कूष्मांडा, 23 मार्च को पांचवें स्वरूप स्कंदमाता, 24 मार्च को छठे स्वरूप मां कात्यायनी, 25 मार्च को सातवें स्वरूप मां कालरात्रि, 26 मार्च को आठवें स्वरूप महागौरी पूजा व कन्या पूजन, 27 मार्च को नवरात्रि की अधिष्ठात्री देवी  मां सिद्धिदात्री की पूजा व कन्या पूजन होगा। इस बार मां पालकी पर सवार होकर आएंगी, जिसे शुभ नहीं माना जाता है, मगर वे जब जाएंगी तो हाथी पर सवार होकर जाएंगी यानि सभी कांे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाएंगी। 27 मार्च को ही रामनवमी का पर्व हर्षोल्लास व श्रद्धाभाव से मनाया जाएगा। 
वर्ष में चार बार नवरात्रि पर्व आता है
महाराजश्री ने बताया कि वर्ष में नवरात्रि चार बार आती हैं। चैत्र नवरात्रि व शारदीय नवरात्रि के बारे में तो सभी जानते हैं और चैत्र व शारदीय नवरात्रि पर कोई भी मां की आराधना कर शक्ति अर्जित कर अपने जीवन को सफल बना सकता है। वर्ष की दो अन्य नवरात्रि गुप्त होती हैं। इसी कारण इन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। गुप्त नवरात्रि तंत्र साधना के लिए बहुत अधिक महत्व रखती हैं। इसी कारण गुप्त नवरात्रि पर साधक ही मां की आराधना करते हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष में चार बार ऋतु परिवर्तन होता है, जिससे खान-पान विषाक्त हो जाता है। ऐसे में व्रत रखकर फलाहार करने से शरीर को नई उर्जा व शक्ति मिलती है। नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य करना चाहिए। साथ ही नवार्ण मंत्र ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का जाप अवश्य करना चाहिए। इससे जीवन में सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है। मां के तीन स्वरूप मां महाकाली, मां महालक्ष्मी व मां महासरस्वती का ध्यान भी अवश्य लगाना चाहिए। महाकाली की उपासना शक्ति, महालक्ष्मी की उपासना सुख-समृद्वि, खुशहाली व वैभव तथा महासररस्वती की पूजा ज्ञान प्राप्ति के लिए की जाती है।

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