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कैसे गिन लेती मैं हजारों में, आप शामिल हैं जांनिसारों में- श्वेता सिंह उमा

गाजियाबाद। रविवार को आयोजित गोष्ठी के साथ ही ‘बारादरी’ ने छठे वर्ष में प्रवेश कर लिया। अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए संस्थापिका डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने कहा कि देश विदेश के कवियों, शायरों एवं मीडिया की मोहब्बत की बदौलत एक कक्ष से शुरू हुआ गीत ग़ज़लों का यह कारवां आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान हासिल कर रहा है। जिसका अगला पड़ाव जल्द ही ‘अंदाज़ ए बयां और’ के रूप में सामने आने वाला है। कार्यक्रम अध्यक्ष वेद प्रकाश शर्मा ‘वेद’ ने कहा कि ‘बरादरी’ को गजल के इतिहास के क्षेत्र को संकलित करने का काम भी करना चाहिए। ‘बरादरी’ छठे साल में प्रवेश की शुरूआत आशीष मित्तल की सरस्वती वंदना व  शायर मनोज अबोध के खूबसूरत ग़ज़ल से हुआ।
नेहरू नगर स्थित सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित ‘महफ़िल ए बारादरी’ में मुख्य अतिथि फरहान अहसास ने कहा अपने अशआर पर भरपूर दाद बटोरी।

उन्होंने कहा कि ‘बारादरी’ में आकर यह सुकून मिलता है कि यहां हिंदुस्तान एक जगह सिमटा मिलता है। रूस से आई कवयित्री श्वेता सिंह ‘उमा’ ने भी अपने शेर ‘कैसे गिन लेती मैं हजारों में, आप शामिल हैं जांनिसारों में’ पर जमकर दाद बटोरी। उन्होंने कहा कि ‘बारादरी’ की महफ़िलें  साहित्यिक कुंभ का आनंद देती हैं। डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने अपने अशआर ‘वो जो जान-ओ-जिगर में रहता है, ज़िन्दगी के सफ़र में रहता है। जिसको दिल ने छुपाना चाहा था, वो हमेशा ख़बर में रहता है’ भी सराही गईं। सुरेन्द्र सिंघल ने अपनी नज़्म ‘ सर्द रात और तुम्हारी याद ‘ के साथ-साथ अपने शेरों पर भरपूर दाद बटोरी। मासूम गाजियाबादी, उर्वशी अग्रवाल ‘उर्वी’, बी. के. वर्मा शैदी, डॉ. तारा गुप्ता की रचनाएं भी सराही गईं।
मनोज अबोध की पंक्तियों ‘मैंने तो बेटा भेजा था तुझे पढ़ने के लिए, धर्म का कीड़ा तेरे बस्ते में कैसे आ गया। और भी सिद्धांत गांधी के करो लागू कभी, पूरा गांधीवाद इक चरखे में कैसे आ गया’ से कार्यक्रम की शुरूआत हुई।
ईश्वर सिंह तेवतिया के गीत ‘अर्ध सत्‍य से प्‍यार’ की पंक्तियां ‘बात चांदनी की सुनते ही क्रोध धूप को आ जाता है, सूरज की भी महिमा सुनना नहीं चांद तक को भाता है, गर पूरब की बात करोगे तो पश्चिम झुंझला जाता है, पश्चिम की तारीफों को भी पूरब कहां पचा पाता है, सच्‍चाई का संबंधों से वैमनस्‍य है ये कहना है, अर्ध सत्‍य से प्‍यार आज का पूर्ण सत्‍य है ये कहना है’ भी सराही गई। महाकुंभ त्रासदी पर जगदीश पंकज के गीत की यह पंक्तियां आंसुंओं को पोंछते रूमाल, पल्लू के किनारे पूछते हैं, कहां पर जा छिप गए हमसे हमारे, शवों में खोजें कहां जाकर, यहां पर बिन सहारे..’ भी सराही गई। इस अवसर पर मशहूर शायर सरवर हसन खान को बारादरी की ओर से ‘जीवन पर्यन्त साहित्यिक सृजन सम्मान’ और विपिन जैन एवं अनिमेष शर्मा ‘आतिश’ को ‘बारादरी विशिष्ट सृजन सम्मान’ प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन खुश्बू सक्सेना ने किया। इस अवसर पर ताबिश खैराबादी, वी. के. शेखर, इंद्रजीत सुकुमार, वागीश शर्मा, प्रेम सागर प्रेम, शुभ्रा पालीवाल, संजीव नादान और मनोज शास्वत की रचनाएं भी सराही गईं। इस अवसर पर आलोक यात्री, के. के. जायसवाल, सत्य नारायण शर्मा, राधारमण, नीलम सिंह, डॉ. सुमन गोयल, अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव, फरहत खान, राष्ट्र वर्धन अरोड़ा, तिलक राज अरोड़ा, कविता अरोड़ा, राम प्रकाश गौड़, के. पी. सिंह, शशिकांत भारद्वाज, दीपक श्रीवास्तव ‘नीलपदम’, तेजवीर सिंह, उत्कर्ष गर्ग व सिमरन सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।

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