Homeगाजियाबादसामाजिकसांस्कृतिक

कला-साहित्य की दृष्टि से समृद्ध रहा है गाजियाबाद – हरिदत्त शर्मा

वसंत पंचमी के पावन अवसर पर अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान ने करायी परिचर्चा

गाज़ियाबाद। वसंत पंचमी के पावन अवसर पर ‘कला-साहित्य और गाजियाबाद’ विषय पर अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के द्वारा एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।राजनगर डिस्ट्रिक्ट सेंटर के शिवम् टॉवर के एक कार्यालय में संपन्न हुई इस परिचर्चा में संगीत, चित्रकला व साहित्य से जुड़ी हस्तियों ने भाग लिया।उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सदस्य रहे और भातखंडे संगीत विद्यालय के निदेशक हरिदत्त शर्मा ने संगीत के क्षेत्र में गाजियाबाद की स्थिति का उल्लेख करते हुए बताया कि वह 1972 में सेठ मुकुंद लाल इंटर कॉलेज में संगीत के शिक्षक नियुक्त हुए।तभी से संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण से जुड़े रहे हैं।
उस समय कुछ महाराष्ट्रियन परिवार संगीत से जुड़े थे।उनमें से एक नाटु साहब का परिवार भी था।उस परिवार से सुशीला इंटर कालेज में तारा बेहरे संगीत की शिक्षिका थीं।उन्होंने आगे बताया कि उनके बड़े भाई सोमदत्त शर्मा दयावती मोदी स्कूल में पढ़ाते थे।हमारे परिवार के बाइस लोग संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण से जुड़े हैं। इसके अलावा डा विमला गुप्ता, अल्का शर्मा, हरिओम शर्मा व शांतिस्वरूप शर्मा ने भी संगीत सिखाने का काम किया है।ए के चावला ने दस डीएवी स्कूल खोले जिन में संगीत की शिक्षा प्रदान की जाती थी। विजयश्री मनोरकर, सुंदर लाल सहगल आदि के नाम भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।
गुरु हीरालाल ने डा सिंघल की बेटी आभा बंसल को नृत्य की शिक्षा प्रदान की।अब आभा के नूपुर कथक केंद्र में करीब 40 बच्चे कथक सीख रहे हैं।तपन राय, फाल्गुनी नियोगी, मनीषा शर्मा इस समय संगीत के अच्छे शिक्षक हैं।संगीत सीखने वाले शिक्षार्थियों की संख्या के मामले में गाजियाबाद सबसे आगे है।यह अलग बात है कि अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाला कोई नहीं हुआ है।
परिचर्चा में चित्रकला का प्रतिनिधित्व करते हुए सुप्रसिद्ध चित्रकार डॉ लाल रत्नाकर ने बताया कि वर्ष 1992 में उन्होंने एम एम एच कालेज के कला विभाग में ज्वाइन किया।वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़कर आए थे।यहाँ कॉलेज में उन्होंने पाया कि शिक्षक और शिक्षार्थी कला के शिक्षण व प्रशिक्षण को लेकर गंभीर नहीं थे।उन्होंने विभाग की स्थिति को बदलने के लिए प्रयास किए।वर्ष 1996 में ललित कला अकादमी में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी जो बेहद सफल रही।बाद में गाजियाबाद के तत्कालीन ज़िलाधिकारी संतोष यादव के सहयोग से उन्होंने सफल क्षेत्रीय प्रदर्शनी कराई।बाद में प्रशासनिक सहयोग न मिल पाने के कारण वह सिलसिला थम गया।
कथाकार सुभाष अखिल ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वर्ष 1953 में उनका जन्म गाजियाबाद में ही हुआ।उस समय गाजियाबाद चारदीवारी के अंदर सिमटा हुआ एक छोटा सा क़स्बा था।उस समय नगर में दो नाट्य संस्थाएं स्टुडेंट क्लब, वीर अभिमन्यु, होती थीं।उनके पिता और ताऊ उन नाट्य संस्थाओं में काम करते थे।वहीं से उनके अंदर कला-साहित्य के संस्कार पैदा हुए।पिता की नौकरी दिल्ली में होने के कारण फिर हमारा परिवार दिल्ली में रहने लगा।मेरी शिक्षा-दीक्षा वहीं पर हुई।नवभारत टाइम्स में नौकरी वहीं पर की।बाद में वर्ष 2003 मे मैं फिर से गाजियाबाद की वसुंधरा कॉलोनी में आकर रहने लगा।इस तरह फिर से मैं गाजियाबाद के साहित्य समाज का हिस्सा हो गया।
परिचर्चा को सार्थकता प्रदान करते हुए सुप्रसिद्ध नवगीतकार व आलोचक वेद शर्मा वेद ने कहा कि ग़ाज़ियाबाद का साहित्यिक समाज खेमेबाज़ी का शिकार हो गया।जिस वजह से निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं हो पाया।देवेंद्र शर्मा इंद्र जी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देवेंद्र जी ने रचा तो खूब लेकिन निष्पक्ष आलोचना से वह बचते रहे।इस व्यवहार से साहित्यिक नुक़सान हुआ।
आकाशवाणी के उपनिदेशक रहे सोमदत्त शर्मा ने कहा कि गाजियाबाद के कवि मंच के प्रलोभन का शिकार हो गए और चेक व तालियों के शोर में खो गए।
परिचर्चा को उसके निष्कर्ष पर पहुँचाते हुए संस्थान के संस्थापक व वरिष्ठ नवगीतकार डॉ धनंजय सिंह ने कहा कि ग़ाज़ियाबाद में हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय स्तर का कवि सम्मेलन होता था।हर प्रसाद शास्त्री जी द्वारा गठित गाजियाबाद लोक परिषद के द्वारा उस कवि सम्मेलन का आयोजन कराया जाता था।उन्हीं के द्वारा हिंदी भवन का निर्माण कराया गया।लेकिन उनके निधन के बाद हिंदी भवन व लोक परिषद कुछ लोगो की निजि जागीर बन कर रह गए।


परिचर्चा में दिल्ली से आईं मंजुला श्रीवास्तव ने कहा कि गाजियाबाद की साहित्यिक संस्था अमर भारती गंभीर विमर्श का एक सशक्त मंच बन गई है।नोएडा से आए विनय विक्रम सिंह ने कहा कि जिस तरह की चर्चा -परिचर्चा गाजियाबाद में हो रही है, नोएडा में उसका अभाव है।चर्चित बाल साहित्यकार रजनीकान्त शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार अमरेन्द्र राय, डॉ रमेश कुमार भदौरिया एवं विश्राम सिंह ने भी अपने मूल्यवान विचार साझा किए।माँ सरस्वती की स्वरचित वंदना डॉ रमेश कुमार भदौरिया ने प्रस्तुत की।परिचर्चा का संचालन करते हुए संस्थान के महासचिव प्रवीण कुमार ने कहा कि गाजियाबाद में कोई ऐसा सार्वजनिक स्थान नहीं है जो कला-साहित्य के संवर्धन के लिए काम कर रही संस्थाओं को सहज ही उपलब्ध हो।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button