नफरत की सियासत: मुद्दों पर क्यों नहीं बात?

जितेन्द्र बच्चन के विचारों के अनुसार, अक्टूबर-नवंबर में बिहार और 2026 में तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों के मद्देनज़र नेताओं के सुर बदल चुके हैं। कल तक जो नेता विकसित प्रदेश, सशक्त भारत, संस्कृति और संस्कार की बात करते थे, आज वे केवल धर्म और जाति के जहर पर ध्यान दे रहे हैं। वोट बैंक सुरक्षित करने के चक्कर में, सारा दृष्टिकोण हिंदू-मुस्लिम पर केंद्रित हो गया है।
लेखक कहते हैं कि मां, बहन और बेटियों तक को गाली दी जा रही है और इस तरह की सियासत में जीतकर सत्ता पाने वाले हमारे लिए क्या करेंगे, यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है। आरोप-प्रत्यारोप का खेल इतना तेज है कि नेता खुद को “दूध का धुला” बताते हैं लेकिन उनकी जुबान काबू में नहीं रहती।
आज की राजनीति में जनता और जमीन से जुड़े असली मुद्दे जैसे गरीबी, बीमारी, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और महंगाई गायब हो चुके हैं। मोदी हों या राहुल गांधी, भाजपा हो या कांग्रेस, सभी की नीति एक ही हो गई है — धर्म और मजहब का डर दिखाकर वोट बैंक सुरक्षित करना। जनता से केवल डर का खेल खेला जा रहा है, जबकि वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
लेखक बताते हैं कि घुसपैठिए, रोहिंग्या, वक्फ बोर्ड जैसी बातें मुद्दों की जगह ले रही हैं। सवाल यह उठता है कि जब प्रशासन और सरकार को सब कुछ पता है, तो कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? सभी दल बहाने बनाते हैं, पिछली सरकारों को दोष देते हैं, लेकिन अपनी जिम्मेदारी कभी स्वीकार नहीं करते।
अंत में बच्चन निष्कर्ष निकालते हैं कि यह नफरत की सियासत तभी खत्म होगी जब जनता खुद डर और भ्रम में नहीं फंसेगी। सत्ता के लिए लोकतंत्र का सही इस्तेमाल और मुद्दों पर ध्यान देना ही देश को आगे बढ़ा सकता है। जनता को डराने और भयभीत करने की बजाय नेताओं को वास्तविक विकास और न्याय की दिशा में काम करना चाहिए।



