आदिराज कथकालय में दुर्गाष्टमी का भव्य आयोजन, कथक की मनमोहक प्रस्तुतियों से कृष्णमय हुई संध्या

नई दिल्ली,(आनन्द धारा)। आदिराज कथकालय द्वारा दुर्गाष्टमी का पावन पर्व अत्यंत हर्षोल्लास, श्रद्धा एवं सांस्कृतिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर कथक की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। संपूर्ण संध्या श्रीकृष्ण की भक्ति, भाव और शास्त्रीय नृत्य की अनुपम छटा से कृष्णमय हो उठी। कार्यक्रम की सभी प्रस्तुतियाँ प्रख्यात कथक नृत्यांगना एवं गुरु डॉ. रजनी राव के कुशल निर्देशन एवं नृत्य संरचना में संपन्न हुईं। डॉ. राव दूरदर्शन की उच्च श्रेणी की कलाकार हैं तथा भारत एवं विदेशों में अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियाँ दे चुकी हैं। वे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की वरिष्ठ शोध अध्येता (Senior Fellow) भी हैं। उन्होंने शास्त्रीय नृत्य में भाव एवं रस के विषय पर अपना डॉक्टरेट शोधकार्य पूर्ण किया है।
कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘कथक में ठुमरी एवं कवित्त का भावात्मक सौंदर्य’ रहा। छात्राओं ने कथक के अभिनय पक्ष को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हुए अष्टनायिका के अंतर्गत वासकसज्जा नायिका एवं खंडिता नायिका के मनोभावों को सजीव किया। उनकी भाव-भंगिमाओं, दृष्टि संचालन एवं अभिनय ने दर्शकों को विशेष रूप से प्रभावित किया। इस अवसर पर प्रस्तुत ‘कालिय मर्दन कवित्त’ की असाधारण नृत्य संरचना कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रही। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिय नाग के दमन की कथा को कथक की लयकारी, पद संचालन, अंग संचालन एवं सशक्त अभिनय के माध्यम से अत्यंत प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्तुति ने दर्शकों का हृदय जीत लिया।

कार्यक्रम में आदिराज कथकालय की वरिष्ठतम शिष्या रेणुबाला सिंह सहित स्वाति, अनुराधा, सुमन, संगीता, हेमा, खुशी एवं दिशी ने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से सभी की सराहना प्राप्त की। डॉ. रजनी राव का मानना है कि कथक केवल ताल और लय का प्रदर्शन नहीं, अपितु भारतीय शास्त्रीय परंपरा में निहित भाव, रस, साहित्य एवं आध्यात्मिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति है।
उल्लेखनीय है कि आदिराज कथकालय में कथक एवं भरतनाट्यम की छह वर्षीय गहन एवं व्यवस्थित नृत्य शिक्षा प्रदान की जाती है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की तकनीकी दक्षता के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं आध्यात्मिक विरासत से जोड़ना है। साथ ही निम्न वर्ग के छात्रों को उनके स्कूल जाकर नृत्य की शिक्षा प्रदान करती है। दुर्गाष्टमी के इस पावन अवसर पर शक्ति की आराधना और श्रीकृष्ण की लीलाओं का कलात्मक समन्वय भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा का सुंदर उदाहरण बना। संपूर्ण वातावरण कृष्णभक्ति एवं नृत्य की दिव्य अनुभूति से सराबोर रहा।



