संस्कृति-पुरुष पंडित विद्यानिवास मिश्र की जन्मशती पर संगोष्ठी आयोजित

नई दिल्ली,(आनन्द धारा)। हिन्दी अकादमी द्वारा 21 मई को दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में “सम्यक् भारतीयता के प्रतिनिधि रस-पुरुष पंडित विद्यानिवास मिश्र” विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के अनेक विद्वानों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने भाग लेकर पंडित विद्यानिवास मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से चर्चा की।
चित्र में बाएं से दायें : नागेंद्र पति त्रिपाठी , कुमार अनुपम , कुमुद शर्मा , गिरीश्वर मिश्र , देवेन्द्र शुक्ल , सत्यकेतु सांकृत , प्रभात कुमार , ओम निश्चल संगोष्ठी का संचालन करते हुए डॉ. कुमार अनुपम ने कहा कि भारतीयता को सही अर्थों में समझने के लिए पंडित विद्यानिवास मिश्र को पढ़ना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पंडित जी लोकजीवन से जुड़े साहित्यकार थे, जो परम्परा और आधुनिकता दोनों के समन्वय के पक्षधर थे। उनके अनुसार कला सम्पूर्णता को मापने का पैमाना है तथा परम्परा कोई जड़ वस्तु नहीं बल्कि निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है।
डाॅ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर सत्यकेतु सांकृत ने पंडित जी को गद्य में पद्य का लालित्य लाने वाला विशिष्ट साहित्यकार बताया। उन्होंने कहा कि भारतीयता की आत्मा सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति सम्मान की भावना में निहित है और पंडित जी का सम्पूर्ण साहित्य इसी भाव से ओतप्रोत है। उन्होंने कहा कि परम्परा में सातत्य तो है, लेकिन आधिपत्य नहीं।
प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली के व्यवस्थापक एवं ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका के सम्पादक श्री प्रभात कुमार ने पंडित विद्यानिवास मिश्र और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के गहरे संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दौर है और इसे गति देने के लिए पंडित जी के साहित्य का अध्ययन आवश्यक है।
साहित्य अकादमी की उपाध्यक्ष एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति प्रोफ़ेसर कुमुद शर्मा ने पंडित जी के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि पंडित जी अत्यंत मृदुल और आत्मीय स्वभाव के व्यक्ति थे। वे भारतीयता को आंदोलन नहीं, बल्कि स्वत्व के उत्सर्ग के रूप में देखते थे। प्रोफ़ेसर शर्मा ने उन्हें हिन्दी का “अंतिम योद्धा” बताया।
पंडित जी के जामाता एवं केंद्रीय हिन्दी संस्थान के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर देवेन्द्र शुक्ल ने कहा कि पंडित जी भारतीय संस्कृति के अवमूल्यन को लेकर सदैव चिंतित रहते थे। उनका मानना था कि अतीत से जुड़ना पलायन नहीं बल्कि वर्तमान की संभावनाओं का विस्तार है। उन्होंने पंडित जी के संदेश को “भारतीयता वर्तमानजीवी धर्म है” के रूप में रेखांकित किया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात मनोवैज्ञानिक एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि भारतीय चिंतन समग्रता और परस्पर पूरकता पर आधारित है। उन्होंने कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र लोक और शास्त्र के बीच सेतु का कार्य करने वाले साहित्यकार थे। उन्होंने पंडित जी की व्यंग्य रचनाओं ‘भ्रमरानन्द के पत्र’ और ‘भ्रमरानन्द का पचड़ा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका विचार-दायरा अत्यंत व्यापक था।

कार्यक्रम के अंत में हिन्दी अकादमी के सचिव श्री नागेन्द्र पति त्रिपाठी ने आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र के साहित्य को पाठकों तक पहुँचाने के लिए अकादमी निरंतर प्रयास करती रहेगी।



