

आज प्रातःकाल मानसून की आहट।
बादल की चाल, पक्षियों की चहचहाहट।।
काले काले मोटे बादल।
गरज-गरज के हो गये पागल।।
बादल बीच दामिनी दमकी।
किसानों की आशाएं चमकी।।
हवाएं भी चल पड़ी पुरवाई।
प्रकृति में नवचेतना आई।।
घुमड़-घुमड़ कर बरसों बदरा।
तर कर दो धरती को बदरा।।
पेड़ पौधों में नवजीवन आया।
पशु पक्षियों ने नवराग गाया।।
बादल आए खुशियां लाए।
मानसून अब वापस न जाए।।
रिमझिम रिमझिम बरसे बूंदे।
धरा से मिलकर हरषे बूंदें।।
सोंधी सोंधी अब महकी धरती ।
शस्य श्यामला बन चहकी धरती।।



