
नई दिल्ली। वैवाहिक विवादों में पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे की निजी तस्वीरों और अंतरंग वीडियो का इस्तेमाल अदालत में सबूत के तौर पर करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि वैवाहिक मुकदमों को बदले की भावना का माध्यम नहीं बनाया जा सकता और न ही पति-पत्नी को एक-दूसरे को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की होड़ में शामिल होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि विवाह टूटने की स्थिति में भी दोनों पक्षों को गरिमा और निजता का सम्मान करना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि व्यक्तिगत संबंधों के दौरान साझा की गई निजी तस्वीरें और वीडियो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने या उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किए जाने चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि पहले पति ने अपनी पत्नी की कुछ निजी तस्वीरें और वीडियो अदालत के रिकॉर्ड में प्रस्तुत किए। इसके बाद पत्नी ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए पति की कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड पर दाखिल कर दिए। इस पर अदालत ने कहा कि इस प्रकार की प्रवृत्ति न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
बताया गया कि दोनों की शादी वर्ष 2022 में हुई थी, लेकिन वैवाहिक संबंधों में विवाद बढ़ने के बाद मामला अदालत तक पहुंच गया। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ निजी सामग्री का इस्तेमाल किया, जिस पर अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों में न्यायालय का उद्देश्य विवाद का कानूनी समाधान करना होता है, न कि दोनों पक्षों के बीच व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप या चरित्र हनन को बढ़ावा देना। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच साझा किए गए निजी क्षणों का दुरुपयोग न केवल निजता के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि यह मानसिक उत्पीड़न का कारण भी बन सकता है।
अदालत की इस टिप्पणी को वैवाहिक मामलों में निजता के अधिकार और व्यक्तिगत सम्मान की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकती है, जिससे अदालतों में निजी सामग्री के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।



