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पावन चिंतन धारा आश्रम में मनाया गया गुरु पूर्णिमा उत्सव

गाजियाबाद,(आनन्द धारा)। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर 29 जुलाई 2026 को पावन चिंतन धारा आश्रम, गाजियाबाद में डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ के दिव्य सान्निध्य में गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। यह अवसर विशेष रूप से ऐतिहासिक एवं भावपूर्ण रहा, क्योंकि पहली बार गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर श्रीगुरुजी एवं उनके द्वारा दीक्षित शिष्य एक साथ इस दिव्य उत्सव के सहभागी बने। समस्त वातावरण गुरु-भक्ति, भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत दिखाई दिया।
भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा में गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। गुरु की दिव्य चेतना से आलोकित प्रत्येक शिष्य स्वयं को उस आध्यात्मिक अनुभूति से अनुप्राणित अनुभव करता है, जिसकी प्राप्ति के पश्चात जीवन में किसी अन्य उपलब्धि की आकांक्षा शेष नहीं रहती। अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक गुरु अपने शिष्यों को अपनी संतति की तरह ही स्नेह, संरक्षण और अपनी दिव्य ऊर्जाओं से स्पंदित करते हैं। गुरु पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाई जाती है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

इस अवसर पर डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’, गुरुमाँ डॉ. कविता अस्थाना जी एवं गुरुपुत्र श्री आस्तिक सिन्हा अस्थाना जी सहित समस्त गुरु परिवार ने आश्रम प्रांगण में विराजमान गुरु महाराज स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी, श्रीमाँ शारदा देवी तथा स्वामी विवेकानंद जी का तिलक-वंदन एवं पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धा-सुमन अर्पित किए।
देश के विभिन्न राज्यों से आए दीक्षित शिष्यों की भावपूर्ण उपस्थिति तथा वाद्य-यंत्रों की मधुर स्वर-लहरियों ने पूरे आश्रम परिसर को भक्तिमय और गुरुमय वातावरण से अभिभूत कर दिया। गुरु-वंदना, भजन, ध्यान एवं सामूहिक प्रार्थना के माध्यम से श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य गुरु के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और समर्पण व्यक्त किया।

इस अवसर पर डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ ने अपने आशीर्वचन में कहा कि
गुरुजी ने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में कहा कि “गुरु पूर्णिमा का दिवस भारत के प्रत्येक त्योहार के जैसा अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु की संकल्पना प्रत्येक सम्प्रदाय में लेकिन उसका स्वरूप अलग है, उसका भाव अलग है। विश्व के सारे व्यक्ति गुरु की तलाश में रहते हैं। गुरु हमारी आत्मा का स्वामी है और गुरु के साथ होने की अनुभूति मात्र ही हमें बहुत संबल देती है। गुरु और शिष्य के मध्य आत्मा का संबंध होता है। गुरु सखा भी है और माता – पिता भी है और आचार्य भी! एक पिता अपनी संतति को संपत्ति देता है लेकिन गुरु अपने शिष्य को अपनी संतति के रूप में अपनी शक्ति, अपना ज्ञान, अपना सर्वस्व दे देता है। पूज्य श्रीगुरुजी ने सभी दीक्षित शिष्यों को प्रतिदिन तीन बातें करने के प्रतिज्ञा दिलवाई। पहली बात – किसी भी रूप में सेवा, चाहे वह प्रकृति की की हो या मानव की! दूसरी बात है – साधना जिसमें जप और ध्यान विशेष हैं और इस साधना निरंतर बढ़ाते जाना है। तीसरी बात है – स्वाध्याय करना जिसमें आप कोई धर्म ग्रंथ पढ़ें, शास्त्र पढ़ें। श्री गुरुजी ने अपने सभी दीक्षित शिष्यों को आदेश दिया कि इस संसार के अंधकार में रोशनी की तरह बनो, सहज और सरल रहो, भय, अंहकार और निंदा से दूर रहें। आप सभी का अंतिम लक्ष्य भक्ति प्राप्त करना है। गुरु और शिष्य का संबंध आत्मा के परिष्कार का संबंध है। गुरु का सान्निध्य तभी सार्थक होता है, जब शिष्य में विनम्रता, श्रद्धा, सेवा और निरंतर साधना का भाव हो। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं से ज्ञान का आरंभ होता है; और जहाँ समर्पण होता है, वहीं गुरु-कृपा का अवतरण होता है।” कार्यक्रम के सांस्कृतिक एवं भक्तिमय सत्र में आश्रम की सुर साधक मंडली के साधकों—सुश्री ख्याति मेहरा जी, श्री करण मल्होत्रा, श्री आस्तिक सिन्हा अस्थाना तथा अन्य साधकों ने गुरु-भक्ति से ओत-प्रोत भजनों की मधुर प्रस्तुति देकर समूचे वातावरण को और अधिक दिव्य एवं आध्यात्मिक बना दिया। उपस्थित श्रद्धालु भजन-संध्या में भावविभोर होकर गुरु-भक्ति के रस में सराबोर हो गए।
गुरु पूर्णिमा महोत्सव ने उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि गुरु केवल ज्ञानदाता ही नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, सेवा, करुणा और आत्मबोध की दिशा में अग्रसर करने वाले दिव्य पथ-प्रदर्शक हैं। यह पर्व भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की अमूल्य विरासत को सुदृढ़ करने तथा आध्यात्मिक चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का प्रेरक माध्यम है।

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