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भारतीय साहित्य पर फिल्म बनाने के लिए फिल्मकार फिर से आगे आयें –प्रदीप सरदाना

नई दिल्ली (सुशील कुमार शर्मा)। साहित्य समाज का मन है तो सिनेमा समाज का चेहरा। साहित्य शब्दों की विधा है तो सिनेमा दृश्य और ध्वनि की। हमारी बहुत सी साहित्यिक कृतियों पर बेहद खूबसूरत, सफल और कालजयी फिल्में बनी हैं। लेकिन यह अत्यंत दुखद है कि अब हमारे अधिकांश फिल्मकार भारतीय साहित्य पर फिल्म न बनाकर विदेशी साहित्य पर फिल्म बना रहे हैं। यही कारण है कि हमारी फिल्मों से भारतीयता दूर होती जा रही है। यदि ऐसे ही चलता रहा तो हमारा साहित्य भी विश्वपटल पर आने की जगह पुस्तकों में सिमट कर रह जाएगा। उपरोक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, कवि, विचारक और विख्यात फिल्म समीक्षक प्रदीप सरदाना ने ‘साहित्य और सिनेमा, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ’ में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये। गुजरात और देश के प्रतिष्ठित ‘सरदार पटेल विश्वविद्यालय,वल्लभ विद्यानगर,आणंद द्वारा आयोजित इस एक दिवसीय संगोष्ठी में देश भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के आचार्य, कई साहित्यकार और फिल्म विद्वानों ने हिस्सा लिया। विश्वविद्यालय के आचार्य एवं हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. दिलीप मेहरा इस अविस्मरणीय आयोजन के संयोजक थे।

संगोष्ठी का उद्दघाटन करने के पश्चात श्री सरदाना ने कहा-‘’जब से सिनेमा का जन्म हुआ तभी से उसका सम्बन्ध साहित्य से है। भारत की पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ जहाँ पौराणिक साहित्य पर थी। वहाँ महाकवि कालिदास की कालजयी कृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ पर 1920 में ही ‘शकुन्तला’ फिल्म बन गयी थी। साथ ही ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के कथानक पर तो मूक युग से अब तक विभिन्न रूपों में अनेक फ़िल्में बनती आ रही हैं। साथ ही शरत चन्द्र, टैगोर, प्रेम चंद, रेणु, राजेन्द्र सिंह बेदी, आरके नारायण, कमलेश्वर, मन्नू भंडारी और चेतन भगत जैसे अनेक भारतीय साहित्यकारों की कृतियों पर असंख्य फिल्म बनी हैं। यूँ प्रेम चंद सहित कई साहित्यकारों को शिकायत रही कि फिल्मकार उनकी कृतियों की ह्त्या कर देते हैं।’’
श्री सरदाना ने कहा- “फिर यह भी कहा जाता है की साहित्य कृतियों पर बनी फ़िल्में सफल नहीं होतीं। लेकिन मेरा मानना है कि जब भी किसी साहित्यिक रचना पर किसी अच्छे निर्देशक ने अच्छी फिल्म बनायी है वह सफल हुई है। देवदास, आनंदमठ, काबुलीवाला, रजनीगंधा, उपहार, उमराव जान और थ्री इडियट जैसी कितनी ही फ़िल्में इस बात का सशक्त उदाहरण हैं। इन फिल्मों के दर्शकों पर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से पड़ते रहे हैं। फिल्मकार विदेशी साहित्य पर भी फिल्म बनायें। लेकिन भारत कहानियों का देश है इसलिए अपने देश के साहित्य पर फिल्म बनाने के लिए फिल्मकार फिर से आगे आयें। तभी भारतीय कथा, संस्कृति और मूल्यों की परंपरा आगे बढ़ सकेगी।’’
प्रदीप सरदाना के इस व्याख्यान का उपस्थित सभी विद्वानों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। साथ ही सरदार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. निरंजन भाई पटेल ने भी प्रदीप सरदाना को सरदार पटेल का विशेष चित्र देकर सम्मानित किया।
समारोह में पुनीत बिसारिया, भरत मेहता, बलिराम धापसे, विनोद विश्वकर्मा, महेंद्र प्रजापति, ईश्वर आहिर, प्रदीप विश्वकर्मा, पंकज लोचन सहाय, बापूराव देसाई और चिराग परमार सहित कुछ और विद्वानों ने भी अपने वक्तव्य दिए। डॉ. दिलीप मेहरा ने कहा-‘’कुलपति प्रो. निरंजनभाई पटेल के नेतृत्व में सरदार पटेल विश्वविद्यालय सदा सार्थक और श्रेष्ठ आयोजन का पक्षधर रहा है। हमें प्रसन्नता है कि हमारा यह आयोजन भी बेहद सफल रहा।‘’

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