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‘बारादरी’ में रचनाओं के जरिए किया गया वैश्विक हालात पर चिंतन

गाजियाबाद,(आनन्द धारा)। महफ़िल ए बारादरी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए अंतर्राष्ट्रीय कवि डॉ. प्रवीण शुक्ल ने कहा कि कोई भी कार्यक्रम भीड़ से बड़ा नहीं होता वहां सुनी गई रचनाओं से बड़ा होता है। अदब के लिहाज से बारादरी का मंच निरंतर समृद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि विचार और सृजन के सामने शोहरत के पैमाने टूट जाते हैं। बारादरी की शोहरत बुलंद होने की खास वजह यह है कि यहां विचार, भाषा और शिल्प की त्रिवेणी मौजूद है। इस अवसर पर भावना मिश्रा को जहां “बारादरी सृजन सम्मान’ से अलंकृत किया गया, वहीं सुप्रसिद्ध वरिष्ठ शायर सुरेंद्र सिंघल को संस्था के नए अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।
सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल नेहरू नगर में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. प्रवीण शुक्ल ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने सामाजिक परिदृश्य पर प्रहार करते हुए कहा ‘खरे करता है सारे काम कुछ खोटा नहीं करता, अहम का अपने चारों ओर परकोटा नहीं करता। बड़ा है आदमी सच में वही किरदार से अपने, जो अपने सामने वाले का कद छोटा नहीं करता’। संस्था अध्यक्ष सुरेंद्र सिंघल ने अपने हर शेर पर दाद बटोरी। उन्होंने कहा ‘हमें भी आ गया है वार करना, समझ जाओ तो अच्छा है वगरना। हमेशा घात में रहते हैं घात करते हैं, वो प्यार जैसी कोई वारदात करते हैं’।

संस्था की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ को शेर ‘दर्द दिल का संभल न जाए कहीं, आज की शाम ढल न जाए कहीं। पंख फैले हुए हैं अभी मेरे, रुख़ हवा का बदल न जाए कहीं’ पर श्रोताओं की भरपूर दाद मिली। रूस से आई डॉ. श्वेता सिंह ‘उमा’ के शेरों ‘जख्मों की चारासाजी जो कर जाते हैं, ऐसे रिश्ते दिलों में उतर जाते हैं। खुद-तराशी का जिसको शऊर आ गया, रफ्ता रफ्ता वही तो निखर जाते हैं। जिस जगह रूह बेचैन होने लगे, हम ‘उमा’ उस जगह पर ठहर जाते हैं’ पर भरपूर दाद मिली। कार्यक्रम का संचालन आलोक यात्री व तरुणा मिश्रा ने संयुक्त रूप से किया। तरुणा मिश्रा के शेर ‘जिंदगी मौत के पहलू में परी लगती है, यूं बदलती है वो सूरत कि नई लगती है। सांस दर सांस सभी जहर में डूबे हैं यहां, मौत के खौफ से हर शक्ल डरी लगती है’ भरपूर सराहे गए।

मुख्य अतिथि शिक्षाविद व कवयित्री डॉ अलका अग्रवाल ने अपनी रचना ‘अनमोल खजाना’ से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं सुप्रसिद्ध नृत्यांगना फाल्गुनी नियोगी ने कहा कि इतनी समृद्ध रचनाएं सुन कर वह अभीभूत हैं। युद्ध की विभिषिका पर वैश्विक चिंतन की स्थिति को जगदीश पंकज ने कुछ यों व्यक्त किया ‘एक मवाली बना चौधरी, धमकाता सा दीख रहा है, अपनी ताकत, डर दिखला कर, देता सबको सीख रहा, दंभ उच्चता के सपनों का दिखला कर हम रोज मर रहे! खतरे का बज रहा सायरन…, हम नुक्कड़ पर बहस कर रहे…’। बी. के. वर्मा’ शैदी’ के शेर ‘कह दो ये अमीरों से खुलूस और वफा की, कीमत कभी सिक्कों से अदा हो नहीं सकती। हस्ती है उसूलों पे टिकी छोड़ दूं कैसे, बुनियाद इमारत से जुदा हो नहीं सकती’ भी सराहे गए।

डॉ. तारा गुप्ता की पंक्तियां ‘मौन रहने का जिसको भी अभ्यास है, शख्स मेरे लिए वो खास है’, नेहा वैद के गीत ‘आजकल मैं हाथ अपने देखती हूं मुस्कुराकर…’, ईश्वर सिंह तेवतिया के गीत ‘उसके बच्चे उसके पास बैठने से अब कतराते हैं, घर आने-जाने वालों को कभी न उससे मिलवाते हैं, ड्राइंग रूम से कभी ठहाकों की जब आवाजें आती हैं, घोर उपेक्षा पर अपनी जब उसकी आंखें भर आती हैं, तब लगता है उसकी दौलत किसी गैर ने कब्जाई है, जीवन भर के जप का तप का हासिल उसकी तन्हाई है…’, प्रदीप भट्ट की पंक्तियां ‘जब लक्ष्य किया निर्धारण तब, रक्खा मक़सद मंजिल पाना, अच्छे बच्चों की आदत है पढ़ते पढ़ते ही सो जाना’, कीर्ति रतन की पंक्तियां ‘संभाले रक्खा गुरूर अपना सफर के मुश्किल रहगुजर में, मेरी अना को कुचल के रख दे किसी की जुर्रत नहीं हुई है’, सुरेंद्र शर्मा का मुक्तक ‘बिना पतवार कश्ती पार हो जाए, चमन वीरां गुले गुलजारर हो जाए, भले हो नाम पर इतना न हो यारों, सड़क पर टहलना दुश्वार हो जाए’ भी सराही गईं।
वागीश शर्मा ने ‘तुम वही हो, हम वही है देखिए, हाल दिल का है डरा सा क्या हुआ’ पर श्रोताओं की दाद पाई। आशीष मित्तल ने अपनी गीत की पंक्तियों ‘लूट गया दिल एक भंवरा, ये गुल तबसे क्या महका, वसंत के दिन थे, हसीं गुलशन थे, हम थे चमन की बाहों में, एक मतवारा प्यार का मारा, खोया प्यार की राहों में, आंख लड़ी बस फिर और क्या, लूट गया दिल एक भंवरा…’ पर श्रोताओं का दिल जीत लिया।

इसके अलावा योगेन्द्र दत्त शर्मा, डॉ. वीना मित्तल, अनिमेष शर्मा ‘आतिश’, सुमित्रा शर्मा, विपिन जैन, प्रवीण त्रिपाठी, डॉ. नरेंद्र शर्मा, सुरेंद्र शर्मा, इंद्रजीत सुकुमार, सोनम यादव, कीर्ति रतन, दीपक श्रीवास्तव ‘नीलपद्म’, प्रदीप भट्ट, संजीव शर्मा, सुबोध कुमार, विनोद कुमार ‘विनय’, यश शर्मा की रचनाएं भी सराही गईं। इस अवसर पर सत्य नारायण शर्मा, सुभाष चंदर, सुशील शर्मा, सिनीवाली शर्मा, डॉ. सुमन गोयल, सुभाष अखिल, अविनाश शर्मा, सुखबीर जैन, मनोज शर्मा, अवधेश श्रीवास्तव, डॉ. बीना शर्मा, राष्ट्रवर्धन अरोड़ा, आलोक सिन्हा, संजय पांडेय, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, सुनील अग्निहोत्री, प्रज्ञा मित्तल,‌ शीतल सिंह, साबिर हुसैन, उत्कर्ष गर्ग, मीनू त्रिपाठी, अभिषेक सिंघल, संजीव अग्रवाल व वत्सल सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।

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