
मुरादनगर,(आनन्द धारा)। हिसाली गाँव में10 अक्टूबर 2026 को पितृविसर्जनी अमावस्या के पावन अवसर पर पावन चिंतन धारा आश्रम द्वारा हिसाली गाँव, मुराद नगर में 18वें पितृदोष निवारण महायज्ञ का आयोजन किया गया। परमपूज्य संत डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ के दिव्य सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में संपन्न इस धार्मिक अनुष्ठान में वैदिक विधि-विधान के अनुसार पितरों के प्रति श्रद्धा, सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त की गई। देश के विभिन्न शहरों से आए श्रद्धालुओं, दीक्षित साधकों, आश्रम रतनो, आश्रम परिवार के सदस्यों एवं अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने सपरिवार इस आयोजन में भाग लिया।
अनुष्ठान का शुभारंभ आश्रम के पुरोहित द्वारा गरुड़ पुराण के पाठ से हुआ। इसके पश्चात आश्रम के बच्चों ने गायत्री मंत्र एवं महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया। मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने ध्यान किया। इसके उपरांत पितृदोष निवारण के उद्देश्य से विशेष समिधा के साथ हवन किया गया, जिसमें 108 आहुतियाँ अर्पित की गईं। कार्यक्रम में संकल्प, मंत्र-जाप, विशेष पूजा-अर्चना एवं तर्पण सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। पितरों की शांति, सद्गति एवं उनके आशीर्वाद की कामना के साथ श्रद्धालुओं ने पूर्ण श्रद्धा और भाव से सहभागिता की।
अपने उद्बोधन में परम पूज्य श्रीगुरु डॉ. पवन सिन्हा जी ने पितरों के प्रति कर्तव्य, श्रद्धा एवं कृतज्ञता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने पितृपूजन की दो प्रमुख विधियों—हव्य और कव्य—की व्याख्या करते हुए बताया कि हव्य का संबंध हवन एवं यज्ञ में आहुति अर्पित करने से है, जबकि कव्य के अंतर्गत तर्पण आदि कर्म आते हैं। उन्होंने भारतीय सनातन परंपरा में इन धार्मिक विधियों के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को भी रेखांकित किया। श्रीगुरुजी ने अपने संबोधन में आगे कहा कि मनुष्य के आचरण, व्यवहार और कर्मों का उसके जीवन एवं पारिवारिक वातावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कई बार व्यक्ति अपने कर्मों के परिणामों के प्रति सजग नहीं होता और अनजाने में अथवा जानबूझकर ऐसे आचरण करता है, जो परिवार में तनाव, आपसी मनमुटाव एवं अशांति का कारण बन सकते हैं। उन्होंने सत्यनिष्ठा, सदाचार, पारिवारिक सौहार्द और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूकता को जीवन में सुख-शांति स्थापित करने के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने पितृदोष से संबंधित पारंपरिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि परिवार में निरंतर तनाव, अस्थिरता, संबंधों में कटुता और जीवन में बाधाओं जैसी स्थितियों को इन मान्यताओं के संदर्भ में देखा जाता है।

ऐसे में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ व्यक्ति को अपने व्यवहार, विचारों और दैनिक जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास भी करना चाहिए। ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पूज्य गुरूजी ने कहा कि ध्यान आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण अंग है। इसी भावना के अनुरूप महामृत्युंजय मंत्र-जाप के पश्चात सभी श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से ध्यान किया।
अनुष्ठान के उपरांत आयोजित सत्संग में श्रीगुरुजी ने श्रद्धालुओं को जीवन में सुख-शांति बनाए रखने, परिवार में सकारात्मक वातावरण विकसित करने तथा दैनिक दिनचर्या में आवश्यक सुधार करने के विषय में मार्गदर्शन दिया। उन्होंने आध्यात्मिक साधना के साथ अच्छे आचरण, नैतिक मूल्यों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन पर बल दिया एवं प्रश्नोत्तर सत्र में गुरूजी ने आध्यात्मिक एवं निजी प्रश्नों के उत्तर दे जिज्ञासुओं का मार्ग दर्शन किया। महायज्ञ एवं पूजा-अर्चना के समापन के पश्चात श्रद्धालुओं को परम पूज्य श्रीगुरु डॉ. पवन सिन्हा जी द्वारा अभिमंत्रित सुपारी का वितरण भी किया गया।

कार्यक्रम में प्रशासनिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। इनमें ग्रेटर नोएडा के एसडीएम हरि जी एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गार्गी जी, संभल के सीडीओ गोरखनाथ अपने परिवार सहित तथा परिवर्तन स्कूल, गाजियाबाद की प्राचार्य श्रीमती संगीता शर्मा के परिवार सहित अन्य विशिष्ट अतिथि शामिल रहे।



