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उत्तराखंड की मनोरम वादियों में प्रख्यात लेखिका वन्दना यादव के चर्चित उपन्यास “पंजा” पर साहित्यिक संगोष्ठी का सफल आयोजन

(आनन्द धारा/सुशील कुमार शर्मा)

गाजियाबाद। उत्तराखंड की मनोरम पर्वतीय वादियों, प्रकृति की शीतल छाया और साहित्यिक वातावरण के बीच लैंसडौन में 22 से 24 सितंबर तक तीन दिवसीय ‘नेचर एंड लिटरेचर रिट्रीट’ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखिका वंदना यादव के चर्चित उपन्यास ‘पंजा’ पर एक विशेष साहित्यिक संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। लैंसडाउन के गोउनु क्षेत्र में आयोजित इस संगोष्ठी में साहित्य, सेना, समाज और प्रकृति से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संयोजन युवा लेखिका शिवानी यादव ने किया।

इस आयोजन का विशेष महत्व इसलिए भी रहा कि उपन्यास ‘पंजा’ के नायक ‘बंधू’ की जन्मस्थली उत्तराखंड ही है। ऐसे में उसी धरती पर उपन्यास की कथा, उसके पात्र, उसकी संवेदना और उसके रचनात्मक सरोकारों पर चर्चा होना साहित्य और स्थान के बीच एक अनूठा संवाद बन गया। उपन्यास एक वेटरन डॉग के दृष्टिकोण से मनुष्य और पशु के बीच के भावनात्मक संबंधों, सेना के ऑपरेशनों तथा युद्ध और सैन्य जीवन के विभिन्न मानवीय पक्षों को सामने लाता है। संगोष्ठी में हिंदी अकादमी, दिल्ली के पूर्व उपसचिव ऋषि कुमार शर्मा, अद्विक प्रकाशन के सर्वेसर्वा अशोक गुप्ता, नारनौल (हरियाणा) के समाजसेवी गिरीश खेड़ा, शिक्षाविद् मोना खेड़ा, देहरादून से आए कर्नल भरत प्रकाश तथा दिल्ली के कर्नल पुष्पेंद्र कुमार यादव सहित अनेक साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता की।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए ऋषि कुमार शर्मा ने कहा कि ‘पंजा’ को केवल एक फ़ौजी कुत्ते की कहानी मानकर पढ़ना उसके व्यापक मानवीय सरोकारों को सीमित कर देना होगा। उन्होंने कहा कि उपन्यास का नायक ‘बंधू’ मनुष्य के साथ रहते हुए जिस संवेदना, निष्ठा और आत्मीयता को अनुभव करता है, वह पाठक को पशु-मन की दुनिया में प्रवेश करने का अवसर देता है। उन्होंने ‘बंधू’ के मानवीय पक्ष, उसके मनोविज्ञान और उसके अंतरसंवाद पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि पशु बोल नहीं सकते, लेकिन उनकी संवेदनाएँ मौन नहीं होतीं। मनुष्य यदि उनके व्यवहार, उनकी आँखों और उनकी भाव-भंगिमाओं को समझने का प्रयास करे तो एक अलग ही संवेदनात्मक संसार सामने आता है। उन्होंने कहा कि उपन्यास का महत्व इस बात में भी है कि यह मनुष्य और पशु के रिश्ते को दया के स्तर से उठाकर संवेदना, सह-अस्तित्व और आत्मीयता के स्तर तक ले जाता है।

समाजसेवी गिरीश खेड़ा ने कहा कि ‘पंजा’ मनुष्य को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि विकास और आधुनिकता की दौड़ में हम अपने आसपास के जीव-जगत के प्रति कितने संवेदनशील रह गए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे साहित्य की आवश्यकता है जो मनुष्य को अपने अतिरिक्त अन्य जीवों के अस्तित्व और अधिकारों के प्रति भी संवेदनशील बनाए। कर्नल पुष्पेंद्र कुमार यादव ने उपन्यास से जुड़े अपने अनुभव और संस्मरण साझा करते हुए कहा कि सेना और सैन्य जीवन को निकट से देखने वाले व्यक्ति के लिए ‘पंजा’ की कथा कई स्तरों पर आत्मीय अनुभव पैदा करती है। उन्होंने सैन्य अभियानों में प्रशिक्षित कुत्तों की भूमिका, उनके साहस, अनुशासन और अपने संचालकों के साथ विकसित होने वाले गहरे संबंधों का उल्लेख किय। संस्मरणों ने उपन्यास के अनेक प्रसंगों को वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ दिया। कर्नल भरत प्रकाश ने भी अपने सैन्य अनुभवों के आधार पर उपन्यास के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सेना में मनुष्य और प्रशिक्षित पशुओं के बीच बनने वाला संबंध विश्वास, अनुशासन और पारस्परिक निर्भरता पर आधारित होता है। उन्होंने अपने अनुभवों के माध्यम से बताया कि कठिन परिस्थितियों में पशुओं की सूंघने, पहचानने और खतरे को भाँपने की क्षमता कितनी उपयोगी सिद्ध होती है।

अद्विक प्रकाशन के सर्वेसर्वा अशोक गुप्ता ने वंदना यादव की लेखन-यात्रा और उनकी रचनात्मक विविधता पर विस्तार से विचार रखा। उन्होंने कहा कि वंदना यादव ने विभिन्न विधाओं में निरंतर लेखन करते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। अद्विक प्रकाशन द्वारा वंदना यादव की अलग-अलग विधाओं में दस पुस्तकों का प्रकाशन किए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किसी लेखक की रचनात्मक क्षमता का विस्तार उसकी विषय-विविधता से पहचाना जाता है।शिक्षाविद् मोना खेड़ा ने साहित्य को नई पीढ़ी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आज के समय में बच्चों और युवाओं को ऐसे साहित्य से परिचित कराना आवश्यक है जो उन्हें प्रकृति और जीव-जगत के प्रति संवेदनशील बनाए।

लेखिका वंदना यादव ने उपन्यास के कथानक, पात्र ‘बंधू’ तथा इसके पीछे किए गए विस्तृत शोध पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि ‘पंजा’ को रचने के दौरान उन्होंने सैन्य जीवन, ऑपरेशनों और प्रशिक्षित कुत्तों की कार्यप्रणाली से जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि ‘बंधू’ उनके लिए केवल उपन्यास का पात्र नहीं, बल्कि संवेदना का ऐसा माध्यम है जिसके जरिए मनुष्य और पशु के बीच के रिश्ते को नए दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि इस कथा को रचते समय उन्हें यह अनुभव हुआ कि पशु-जगत को समझने के लिए केवल जानकारी नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टि की भी आवश्यकता होती है।

कार्यक्रम की संयोजक युवा लेखिका शिवानी यादव ने वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘पंजा’ के नायक ‘बंधू’ के संदर्भ में पशुओं के साथ मानवीय व्यवहार पर चिंता व्यक्त की और कहा कि ऐसे आयोजन इसी दिशा में एक सार्थक प्रयास हैं।

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