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धरने के 10वें दिन प्रेस वार्ता में छलका दर्द, पुलिस कार्रवाई के विरोध में पीएम-सीएम को भेजेंगे ज्ञापन

गाजियाबाद, (आनन्द धारा)। जनपद पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली और कथित तानाशाही के खिलाफ न्याय की आस में बैठे पत्रकारों का आंदोलन अब उग्र रूप लेता जा रहा है। धरने के 10वें दिन एक भावुक और आक्रोशित प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार ललित चौधरी ने दोटूक कहा, “अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को इतना कमजोर कर दिया गया है कि इसे बचाने के लिए अब बलिदान देने का वक्त आ गया है।”
ललित चौधरी ने गाजियाबाद पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि आखिर क्यों पुलिस के आला अधिकारी अपने ही भ्रष्ट पुलिसकर्मियों को बचाने में लगे हुए हैं?
प्रेस वार्ता के दौरान आपबीती सुनाते हुए ललित चौधरी ने बताया कि यह लड़ाई पिछले 30 दिनों से चल रही है। उन्होंने कहा- बीती 21 मई को हमें कार्रवाई का सिर्फ 3 दिन का आश्वासन मिला था। इसके बाद 24, 27 और फिर 30 मई को तारीखें दी गईं। हमारी साथी अपूर्वा जी ने 10 दिनों तक कड़ा अनशन किया, जिसे एडिशनल पुलिस कमिश्नर ने यह भरोसा देकर खुलवाया था कि 2-3 दिनों में सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन आज हमें धरने पर बैठे 10 दिन हो चुके हैं और इस मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न को झेलते हुए पूरा एक महीना बीत गया है।
अपनी और अपने साथियों की पारिवारिक स्थिति का जिक्र करते हुए ललित चौधरी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि वे किसी रसूखदार या बड़े नेता की औलाद नहीं हैं, बल्कि किसान-मजदूर परिवारों से आते हैं, जहां रोज कमाकर घर का चूल्हा जलता है। आज उनका कामकाज ठप है, बूढ़े मां-बाप और बच्चे घर पर राह देख रहे हैं।
उन्होंने पत्रकार साथी अपूर्वा जी के साहस को सलाम करते हुए कहा कि वे पिछले दो महीने से बेहद बीमार हैं और उनका गंभीर ऑपरेशन होना बाकी है। इसके बावजूद, गिरते स्वास्थ्य के साथ वे 24 घंटे धरने पर डटी हुई हैं क्योंकि हम पूरी तरह निर्दोष हैं। ललित चौधरी ने दावा किया कि मुझे मुख्य आरोपी बनाए जाने के बावजूद मेरे मुख से किसी महिला या पुलिसकर्मी के लिए एक भी अपशब्द नहीं निकला है।
ललित चौधरी ने बताया कि उन्होंने अपनी बेगुनाही के एक दर्जन से अधिक पुख्ता सबूत खुद पुलिस को सौंपे हैं। ललित चौधरी ने कहा, “हमारी शुरू से एक ही मांग थी—अगर हम दोषी हैं तो हमें तुरंत जेल भेजो, और अगर निर्दोष हैं तो हमारे साथ दुर्व्यवहार करने वाले अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई करो। लेकिन प्रशासन की खामोशी साफ करती है कि वे अपनी नाकामी छिपाने और हमारा मनोबल तोड़ने के लिए अफवाहें उड़ा रहे हैं।”
ललित चौधरी ने साफ किया कि पुलिस ने पत्रकार और जनता के बीच जानबूझकर एक ऐसी खाई खोद दी है, ताकि कोई भी पत्रकार किसी पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए थाने-चौकी न जा सके। इस तानाशाही के खिलाफ अब आंदोलन को राष्ट्रव्यापी बनाने की तैयारी है।
गाजियाबाद पुलिस प्रशासन से उम्मीद टूटने के बाद, कल सुबह आंदोलनकारी जिलाधिकारी (DM) गाजियाबाद के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक ज्ञापन सौंपेंगे। इस ज्ञापन में गाजियाबाद पुलिस की तानाशाही की शिकायत के साथ-साथ पत्रकारों के हित और सुरक्षा के लिए एक बड़ी मांग की जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी कि चाहे उन्हें यहां सालों बैठना पड़े, वे पीछे नहीं हटेंगे। हमारे पत्रकार साथी अब बलिदान देने के लिए भी तैयार हैं।

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