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आज भी रोमांचित कर देता है 35 एमएम फिल्मों का जादू –प्रदीप सरदाना (वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म समीक्षक)

नई दिल्ली,आनन्द धारा,सुशील कुमार शर्मा

भारतीय सिनेमा अपनी एक शताब्दी से भी लंबी यात्रा में तकनीक में नित नए विकास और चमत्कार कर रहा है। आज हम डिजिटल युग में पहुँच चुके हैं। लेकिन 35 एमएम पर बनी फिल्मों के जादू को आज भी भुलाया नहीं जा सकता। उस दौर की फिल्में आज भी रोमांचित कर देती हैं। सच कहा जाए तो 35 एमएम फिल्मों का काल ही भारतीय सिनेमा का स्वर्ण काल था।
उपरोक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार और सुप्रसिद्द फिल्म समीक्षक प्रदीप सरदाना ने ‘इंडिया हेबिटेट सेंटर’ में ‘35 एमएम फिल्म क्लब’ की स्थापना और फिल्म ‘यादों की बारात’ के विशेष प्रदर्शन से पूर्व व्यक्त किए। अपनी कला-संस्कृति और फिल्म गतिविधियों के लिए प्रतिष्ठित ‘इंडिया हेबीटेट सेंटर’ के निदेशक प्रो. डॉ. के. जी. सुरेश ने हाल ही में अपने यहाँ ’35 एमएम फिल्म क्लब की स्थापना की है। जिसके अंतर्गत प्रति माह किसी एक 35 एम एम फिल्म का, उसी स्वरूप में और 35 एमएम प्रोजेक्टर से ही प्रदर्शन किया जाएगा।
निदेशक के जी सुरेश ने इस अवसर पर प्रदीप सरदाना को उनकी 50 वर्ष की लेखन-पत्रकारिता यात्रा और फिल्म समीक्षक के रूप में किए गए उनके अत्यंत विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित भी किया। सुरेश ने बताया-‘’प्रदीप सरदाना का पत्रकारिता और फिल्म संसार में अनुपम योगदान है। इधर अब हमने अपने यहाँ कोने में रखे उस पुराने प्रोजेक्टर पर ही प्रति माह फिल्म दिखाने का निर्णय लिया है, जिस पर किसी समय 35 एमएम फिल्में प्रदर्शित की जाती थीं। इससे दर्शक भारतीय सिनेमा की अविस्मरणिय फिल्मों को फिर से उनके पुराने स्वरूप में देख सकेंगे।‘’
अपने सम्बोधन में सरदाना ने यह भी कहा-‘’अब जब देश भर में किसी भी सिनेमा थिएटर में 35 एमएम फिल्मों को दिखाने वाले प्रोजेक्टर्स नहीं रहे हैं। ऐसे में केजी सुरेश ने भारत के सिर्फ हेबिटेट सेंटर के थिएटर में इस पुरानी विधा को जीवंत कर बेहद प्रशंसनीय कार्य किया है। उधर फिल्म ‘यादों की बारात’ को लेकर भी सरदाना ने कई अनसुनी बातें सभी के साथ साझा कर उपस्थित जन समूह का मन मोह लिया। प्रदीप सरदाना ने बताया-‘’यह फिल्म मेरे दिल के भी बहुत करीब है। अपनी कक्षा 10 की बोर्ड की परीक्षाएं समाप्त होने के तुरंत बाद मैंने ‘यादों की बारात’ को देखा था। लेकिन बरसों बाद भी इसकी यादें आज भी ताजा हैं।

फिल्मकार नासिर हुसैन की इस फिल्म में ‘खोया-पाया’ फॉर्मूला को बहुत ही दिलचस्प ढंग से दिखाया था। अपने माता-पिता की हत्या के बाद बचपन में बिछड़ 3 भाई बड़े होकर धर्मेन्द्र, विजय अरोड़ा और तारिक खान के रूप में किस तरह एक दूसरे को मिलते हैं। यह फिल्म का दिलचस्प पहलू है। तीन नायकों के बावजूद फिल्म में सिर्फ एक ही नायिका है ज़ीनत अमान। फिल्म की एक विशेषता यह भी है कि इसमें ट्रेन और गिटार को शुरू से अंत तक बार बार फोकस किया गया है। फिर फिल्म में खलनायक अजीत के एक पैर में 8 और दूसरे में 9 नंबर का जूता तो ‘यादों की बारात’ को आज भी खास बनाता है। आमिर खान की भी बाल कलाकार के रूप में यह पहली फिल्म है। आरडी बर्मन का संगीत और आशा भोसले के सुर आज भी सिर चढ़ कर बोलते हैं। उधर ‘यादों की बारात निकली है आज’, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ और ‘लेकर हम दीवाना दिल’ जैसे फिल्म के गीत तब से अब तक सदा रोमांचित करते रहे हैं।‘’

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